मानसिक अशांति में रुद्राभिषेक

मानसिक अशांति में रुद्राभिषेक
ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। अतः चन्द्र के पीड़ित होने पर या चन्द्र के पाप प्रभाव में होने पर व् ६,८,१२ के स्वामी होने पर मानसिक विकार बनते हैं । जिस से व्यक्ति निराशा एवं दुःख दाई जीवन व्यतीत करता है। कई बार उन्माद की अवस्था में में पहुँच जाता है। पीड़ित चन्द्र की दशा होने पर एवं चन्द्र के कुंडली में अशुभ प्रभाव में होने पर आशुतोष भगवान् शिव की अराधना सफलता तथा कृपा प्रदान करती है। अतः रहू एवं शनि के कष्ट के साथ साथ चन्द्र के पीड़ित अवस्था में भी निरंतर भगवान् शिव शेखर की अराधना करनी चाहिए। वैसे तो जीवन की हर अवस्था में भगवान् शिव की अराधना ,भगवान् शिव के पृथ्वी का देवता होने के कारण सफलता देती है। लेकिन ज्योतिष की इन ग्रहों की अवस्था में भी शिव कृपा अवश्य भावी है।
शिव कृपा का रूप शिव तांडव स्त्रोत्र
भगवान् शिव के सभी स्रोतों में शिव तांडव का अपना विशेष स्थान है। इस स्त्रोत्र की रचना शिव भक्त महान पंडित लंकाधिपति रावण ने की थी जिसके प्रभाव से आशुतोष भगवान् शिव ने दशानन रावण को सम्पुरण संसार का सबसे शक्तिशाली माव बना दिया था । कहा जाता है एक बार दशानन रावण भगवान् शिव की अराधना करने अपने पुष्कर विमान के द्बारा कैलाश पहुँचा ,वहां पहुँच कर रावण ने अनेक प्रकार के सामग्री से आशुतोष भगवान् शिव की विभिन्न प्रकार से पूजा की ओर निवेदन किया की आप कैलाश पर्वत को छोड़ कर अपने भक्त की नगरी लंका में विराजें जिस से की वो अधिक समय आप की पूजा में लगा सके। नीलकंठ पाशुपत भगवान् शिव ने रावण का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा लंका विराजने के लिए मना कर दिया फलस्वरूप रावण नाराज़ हो गया तथा अपने बल के द्बारा कैलाश पर्वत को उखाड कर लाने के लिए उधाम करने लगा जिस कारण कैलाश पर्वत हिलने लगा जिस से भगवान् शिव की समाधी भंग हो गई । भगवान् शिव नें अपने दायें पैर के अंगूठे से रावण के एक सिर को दबा दिया जिस से वो पाताल लोक में धंसता चला गया। इस से रावण घबरा गया और इस भयानक कष्ट से निकलने के लिए एक नूतन स्त्रोत्र की रचना कर शिव की अराधना की जिस के प्रभाव से वो अपनी दयनीय स्थिति से तो उबरा ही इस के साथ साथ सम्पुरण लोक में सबसे अधिक शक्ति शाली और वैभवशाली सिद्ध हुआ। रावण के द्बारा भगवान् शिव की पूजा में रचा गया यह स्त्रोत्र शिव तांडव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिस का वर्णन इस प्रकार है:

जताताविगालाज्जाला प्रवाहपवितास्थाले
गलेअवालाम्ब्या लम्बितम भुजन्गातुन्गामालिकम
दामाद दामाद दमद्दमा निनादावादामार्वायाम
चक्र चंद्तान्दवं तनोतु नह शिवः शिवम् II1II

जाता कटा हसम्भ्रमा भ्रमानिलिम्पनिर्झारी
विलोलाविचिवालारै विराजमानामुर्धानी
धगाधागाधागाज्ज्वा लालालाता पत्तापवाके
किशोर चन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मामा II2II

धराधारेंद्रना न्दिनिविलासबंधुबंधुरा
स्फुरादिगंतासंटती प्रमोदामानामानसे
क्रुपकताक्षधोरानी निरुधादुर्धरापादी
क्वाचिदिगाम्बरे मनोविनोदामेतुवास्तुनी II3II

जाता बहुजन गपिन्गाला स्फुरात्फनामानिप्रभा
कदम्बकुंकुमा द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे
मदांध सिन्धु रस्फुरात्वगुतारियामेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भुताभार्तारी II4II

सहस्र लोचना प्रभृत्य शेशालेखाशेखारा
प्रसून धुलिधोरानी विधुसरंघ्रिपिथाभुह
भुजन्गाराजा मलय निबद्धाजताजुताका
श्रियै चिराय जयतम चकोर बन्धुशेखारह II5II

लालता चात्वराज्वालाधानाज्न्जयास्फुलिंगाभा
निपितापज्न्चासयाकम नामंनिलिम्पनायाकम
सुधा मयूख लेख्य विराजमानाशेखाराम
महा कपाली संपदे शिरोजतालामास्तु नह II6II

कराला भला पत्तिकाधागाद्धागाद्धागाज्ज्वाला
द्धानाज्न्जय हुतिक्रुता प्रचान्दापज्न्चासयाके
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रका
प्रकाल्पनैकाशिल्पिनी त्रिलोचने रतिर्मम II7II



नवीन मेघा मंडली निरुद्धादुर्धरास्फुरत
कुहू निशिथिनितामः प्रबंधाबद्धाकंधारह
निलिम्पनिर्झारी धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानाबंधुरह शरियम जगाद्धुरंधारह II8II

प्रफुल्ला नीला पंकज प्रपज्न्चाकालिम्चाथा
व्दम्बी कन्थाकंदाली रारुचि प्रबद्धाकंधाराम
स्मराच्चिदम पुरच्छिदं भवच्चिदम मखाच्चिदम
गजच्चिदंधाकचिदम तमाम्ताकच्चिदम भजे II9II

अखार्वगार्वसर्वमंगाला कलाकादाम्बमाज्न्जारी
रसप्रवाह माधुरी विज्रुम्भाना मधुव्रतम
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजन्ताकंधाकंताकम तमन्ताकंताकम भजे II10II

जयत्वदाभ्रविभ्रमा भ्रमाद्भुजन्गामासफुर
धिग्धिग्धि निर्गामात्काराला भाल हव्यवाट
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वा नन्म्रुदंगातुन्गामंगाला
ध्वनिक्रमाप्रवार्तिता प्रचंडा तन्दवः शिवः II11II

दृशाद्विचित्रताल्पयोर भुजंगा मौक्तिकस्राजोर
गरिष्ठारात्नालोष्ठायोह सुह्रुद्विपक्षपक्षयोह
त्रुश्नाराविन्दाचाक्शुशोह प्रजमाहिमाहेंद्रयोह
समां प्रवार्तायान्मनाह कदा सदाशिवं भजे II12II

कदा निलिम्पनिर्झारी निकुज्न्जकोतारे वसंत
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थामाज्न्जलिम वहांह
विमुक्तलोललोचनो लालामाभालालाग्नाकाह
शिवेति मंत्रमुच्चरण सदा सुखी भावंयाहम II13II

इमं ही नित्यमेव मुक्तामुत्तमोत्तमम स्तवं
पथान्स्मरण ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेती संततं
हरे गुरु सुभक्तिमाशु यती नान्यथा गतिम्
विमोहनं ही देहिनं सुशंकरस्य चिन्तनं II14II

पूजा वासनासमाये दशावाक्त्रगितम
यह शम्भुपुजनापरम पत्ती प्रदोश्हे
तस्य स्थिरं राथागाजेन्द्रतुरंगयुकतम
लक्ष्मिम सदैव सुमुखिम प्रददाति शम्भुः II15II




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