स्वेत आर्क के वास्तु गणेश

स्वेत आर्क के वास्तु गणेश
वास्तुशास्त्र में हिंदू दर्शन के अनुसार गणेश की प्रतिमा तथा पूजन का आवासीय शुद्धि एवं अनुकूल ऊर्जा के लिए विशेष महत्तव है इसलिये सभी प्रकार के वास्तु दोषों को दूर करने हेतु दोष्वाले स्थान पर वास्तु गणेश लगाने का विशेष प्राचीन विधान है। वैसे तो वास्तु गणेश अनेक प्रकार की धातुओं के बनाये जाते हैं जिन में सभी के अपने अलग अलग प्रभाव हैं.लेकिन स्वेत आर्क का वास्तु गणेश सभी प्रकार के दोषों को मुक्ति हेतु सबसे सरल साधन तथा मनोकामना सिद्ध करनेवाला कहा जाता है।
स्वेत आर्क एक ऐसा पौधा होता है जिसको हिंदू दर्शन के अनुसार साक्षात् ही गणेश का रूप कहा जाता है इस पौधे के अंतर्गत अनेक औश्धिये एवं दैविक गुण होने के साथ साथ एक विशेष यह भी गुण है कि इसकी जड़ में स्वयं गणेश जी कि आकृति बनी होती है। अगर जड़ को ध्यान से देखा जाए तो इसके बराबर में निकली दो शाखाएँ गणेश जी के दो दातों का कार्य करती हैं एवं इस से आगे का भाग साक्षात् गणेश जी का रूप बना देता है। इस लिए इस पौधे
के पूजन तथा प्रतिमा का विशेष महत्त्व है। प्रतिमा के आभाव में इसकी लकड़ी एवं पुष्प पत्ते सभी भवन को वास्तु दोषों से मुक्त बनते हैं ।
मूर्ति निर्माण का विधान
मूर्ति निर्माण के लिए यह अन्तंत आव्श्येक है कि ज्योतिष अनुसार किसी शुभ महूर्त में सर्व प्रथम स्वेत आर्क के पौधे को गणेश जी साक्षात रूप मान कर गणेश स्त्रोत्र ,गणेश सहस्त्र नाम आदि से चंदन और रोली के साथ में चवाक मिला कर पूजन करे एवं दीप दान करे पूजन के बाद में स्वेतार्क रूपी गणेश जी से अपने घर में पधारने के लिए परार्थना करें। इसके बाद स्वेत आर्क के पौधे को जड़ सहित खुदवा कर निकलवाएँ एवं उस स्थान पर कोई नया धार्मिक पौधा या स्वेत आर्क ही लगा दें । निकाले गए पौधे को अच्छी प्रकार सुखा कर उसकी जड़ को मूर्ति रूप में अंकित करवाएं लेकिन यह प्रतिमा ६ इंच से बड़ी नही होनी चाहिए। प्रतिमा को अंकित कर वाते समय यह ध्यान आवश्यक अन्यन्त आवश्यक की ki मूर्ति भद्र दृष्टि वाली हो। अर्थात आगे पीछे दोनों ओर अंकित हो क्यूँ की वास्तु विदों का मत है की गणेश जी के पीठ पीछे दरिद्रता का वास होता है। अगर प्रतिमा एक रूप वाली हो हो उसे इस प्रकार लगना चाहिए की उसकी दृष्टि घर के अंदर की ऑर हो। सवेत आर्क की लकड़ी काफी कमजोर होती है जिस का लंबे समय तक चलना बड़ा असंभव है। मूर्ति बनने के साथ साथ इस लकड़ी को लम्बी आयु देने के लिए लाल सिंदूर में चमेली का तेल मिला कर रंग कर रखनी चाहिए । जिस से इसको लम्बी आयु मिल सके। सवेत अआर्क के गणेश बनवाते समय यह भी ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है की प्रतिमा का कोई अंग आधुनिक डिजाईन के आधार पर विकृत या अशोभनीय न बनाया जाए। अन्यथा भयानक वास्तु दोष के आसार होते हैं। अतः प्रतिमा सरल सहज तथा दक्षिणा मुखी सूंड वाली हो तो अत्यन्त शुभ होगी। इसके आभाव में दुरे प्रकार की सरल प्रतिमा या सवेत आर्क की लकड़ी को चमेली तेल युक्त सिंदूर में रंग कर किसी लाल कपड़े के अंदर रखना भी वास्तु दोष निवारण का अचूक एवं महत्त्व पूर्ण साधन है।

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