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मौसम बदलाब से उत्पन्न बीमारियाँ

कल दिनाक १६-११-२०१७ को सूर्य शुक्र की राशी तुला को छोड़ कर मंगल की राशी वर्श्चिक में प्रवेश करेंगा | एवं उस की युति बुध के साथ होंगी | परिणाम स्वरूप तेज शीत लहर चलने की पूरण संकेत है |जिस से प्रदूषित वायु स्वस्थ में गिराबट पैदा करेंगे एवं वायु के दूषित प्रभाव के कारण नई बीमारियाँ उत्पन्न होंगी | इस के साथ साथ जब २८-११-२०१७ को शुक्र अपनी उच्च राशी को छोड़ कर मंगल की राशी वर्श्चिक में प्रवेश करेगा | इन दिनों सूर्य  विशाखा नक्षत में है जिस का स्वमी  गुरु है एवं बुध अपने ही नक्षत्र ज्येष्ठा में गौचर कर रहा है | अत मौसम बहुत तेजी से बदलेंगा एवं सीत लहर चलने की सम्भावना भी है | -- मंगल भवन  अमंगल  हारी, द्र्वयु सो  दशरथ  अजर बिहारी | दीन दयाल  विरद  सम भारी,   हरयो  नाथ  मम शंकट भारी .||. Pt.Shriniwas Sharma Mo:9811352415                                                       http:// vedicastrolo...

बढ़ता हुआ वायु प्रदुषण

शनि २६-१०-२०१७ को शनि मंगल वर्श्चिक राशी  को छोड़ कर  गुरु की राशी धनु के मूल नक्षत्र में प्रवेश करगाया मूल नक्षत्र का स्वमी केतु है |जो २५ -१० -२०१७  से शुरू हुआ  है | शनि का गौचर मूल नक्षत्र में होने के कारण वायु जल के प्रदूषण बढ़ेगे | एवं नई नई बीमारी पैदा होंगी | जिनको सभलना  मुस्किल होंगा | इस के साथ साथ वायु यातायात  के कारण अनेक परेशानी होंगी | गुरु को ज्योतिश में जीव कंहा जाता है  शनि का गुरु की राशी में आना जीव को शंकट पैदा  होंगा |  इस लिए वायु यतायात , वायु प्रदूषण  जल यातायात एवं जल प्रदूषण  सभी इस से प्रभावित होंगे इस लिए मानव को अपने खान पान के साथ साथ  वायु प्रदूषण  से बचने का उपाय करना चाहिए  बचाव में ही सफलता संभव है  वन  अमंगल  हारी, द्र्वयु सो  दशरथ  अजर बिहारी | दीन दयाल  विरद  सम भारी,   हरयो  नाथ  मम शंकट भारी .

भीष्म पंचक व्रत का महत्व

Subject: भीष्म पंचक व्रत का महत्व कल दिनाक ०१-११-२०१७  दिन बुधवार तुलसी विवहा का महत्व है एवं आज दिनाक ३१-१०-२०१७ दिन मंगलवार  को देव उठावनी एकादशी है |इस दिन से कार्तिक मास की पूर्णमा भीष्म पंचक व्रत के नाम से जाने जाते है |एकादशी से  पूर्णमा  इन पाच दिनों का विशेष महत्व है | कार्तिक पूरण के अनुसार एकादशी को मंदिर में दीप दान करने एवं गौमूत्र का सेवन  करना एवं रात्रि को कीर्तन  करने का विशेष महत्व है  इस दिन व्रत एवं  जागरण के प्रभाव से  पांडव श्रोमानी  अर्जुन का जन्म  हुआ | जिस से द्व्द्शी को गो के गौवर से शुद्धि कर के  कीर्तन किया वह  भीम बना एवं द्रोद्शी एवं चतुर्दशी को अमले के नीचे भोजन  करने एवं व्रत  करने के प्रभाव से  नकूल एवं सहदेव की उत्पन्न हुआ | जिस ने कार्तिक पूर्णमा को भगवान का व्रत पूजन व्रत एवं पीपल के व्रक्ष एवं मंदिर में ध्वज रोहन किया  वह धर्मराज युधिष्टर हुए एवं  इन पांचो के साथ  जिस महिला ने प्रथक प्रथक  नाच एवं कीर्तन किया  वह द्रोपती हुई| यह कथा जब भगवान श...

नव रात्रीस्थापना शरद कालीन वर्ष -२०१७

Subject: नव रात्रि स्थापना एवं पूजन दिनाक २१-०९-२०१७  दिन गुरुवार से  शरद कालीन  नवरात्री का शुभ आरंभ होगा इस वार नवरात्री का शुभ आरंभ  दिन गुरुवार  नक्षत्र हस्त  योग शुक्ल कारणबव से हो रहा  है  एवं जिस का समापन दिनाक २९-०९-२०१७ दिन शुक्रवार  पूषा नक्षत्र शुभ योग  कारण बा से होगा  | इस वार नवरात्री का शुभ आरंभ गुरुवार के हस्त नक्षत्र में होने के कारण देवी माँ दुर्गा का अगवान  पालकी में होगा  जो भक्त जानो को अतिय्न्त शुभ एवं मनोरथ  पूरण करने बाला है | लेकिन दिनाक २९-०९-२०१७ दिन शुक्र वार  पूषा नक्षत्र में समपन्न होने के कारण देवी का बिदाई  नंगे पैर है  जो  बहुत शुभ नहीं है | लेकिन बहुत ख़राब भी नहीं  है | अत देवी का पालकी में अगवान बहुत शुभ  है एवं नंगे पैर बिदाई  माध्यम  फल साधक को प्रदान करने बली है |                                                  घ...

नारायण बाली पूजन

नारायण बाली एक एसी पूजा है जो मरण अपरांत मानव को बंधन से मुक्त करती है | जीव की मरने के बाद दो प्रकार के स्वरूप होते है  १- प्रेत स्वरूप २ पितृ स्वरूप  जब मरने के बाद आत्मा सूक्ष्म सरीर धारण कर लेती है  तब उसे शांति हेतु पूजा एवं ज्ञान दोनों की अबस्य्कता होती है जिसे सव या प्रेत कंहा जाता है | हिन्दुओ में कपाल क्रिया होने के कारन  मरत आत्माओ को शांति तब तक नहीं मिलती जब तक  उस की गति हेतु उधम न किया जाये | जब जीव की शांति एवं गति हेतु कोई उधम नहीं किया जाता है तो वह भटक जाता है है एवं उस की गति रूक जाती है  जिसे प्रेत कहते है | एसी स्थति में शांति न होने के कारन आत्मा का प्रेत स्वरूप संसार एवं पाने परिजनों को अपने भट्काब के कारन  कष्ट देने लगता है  जिस से संबधी लोगो पर अनेक कष्ट आने लगते है | शास्त्र अनुसार प्रेत की योनी काफी लम्बी होती है  जिस से जैसे जैसे समय बीतता जाता है  वैसे वैसे प्रेत योनी भयानक बनने लगती है  एवं अज्ञानता के कारन तराश एवं  भट्काब अधिक होता है | अगर म्रत्यु  शार्प के दशने से हुई हो , ब्रह्मण शाप...

वैदिक रीति द्वरा संतान प्राप्ति के उपाय

---------- Forwarded message ---------- From:  Shriniwas Sharma   Date: 2017-09-13 18:18 GMT+05:30 Subject: वैदिक रीति सन्तान प्राप्ति हेतु किया गया यज्ञ सफलता दायक To: shriniwas sharma ज्योतिष वेदों की आंख है  हमारे चारो वेदों में  अनेक प्रकार के यज्ञ  अनुष्ठान  आधुनिक चिक्स्था पद्धति से अधिक सफल करी सिद्ध होता है | युज्र्वेद में  प्राकतिक चिकसा का  विशेष महत्व है  जो वेद रीति से चिक्स्था करता है उसी को वेदों ने वेद कंहा है | हमारे वेदों में अनेक इसे  सधन है  जिस का प्रयोग कर अपने भाग्य के अंधकार को  मनाब दूर क्र सकता है | त्रेता युग में महाराजा दशरथ द्वरा  पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ कराया गया  था  जिस की अध्यक्षता लोमस मुनि द्वरा करी गयी थी  उसी के प्रभाव स्वरूप  महाराजा दशरथ के चार पुत्र पैदा हुए  जिनका नाम आज भी विश्व विख्यात है |  अगर हम वेदों की बात करे तो  नस्पुकता  संतान हीनता  कोई विषय ही नहीं  है  वह शर्ते की वैध्य हमारा वैदिक रीति को जानने बाला एव...

धर्म की ओट में पनपता आडंबर

इन दोनों हिन्दू समाज में संत बाबा ओ के नए नए  साड़ीयन्त्र  निरंतर लम्बे समय से उजागर हो रहे है जिस से हिन्दू संतान धर्म के प्रति लोगो की आस्था कभी कमजोर हुई है | हिन्दू संतान धर्म  काफी पुराना धर्म है | जिसमे नित नए आडंबर  उजागर हो रहे है  आधुनिक समय में  सनियासियो का पनपता  चहरा जिस में वह  भगवान् की जगह  अपने को पूजने लगे है  इन आड़म वारी संतो को  भटके हिये समाज को सदमार्ग दिखलाना था | वाही सयम नरक गामी होकर अपने अनुयायी यो को भी चौराहे पर खड़ा कर दिया है  भागवत के ११ वे स्कन्द में काशी नरेश पुंडरिक की कथा आती है  जिस ने अपना स्वरूप श्री क्रष्ण के समान बनाकर  अपने को क्रष्ण घोषित कर दिया था एवं अपने को पूजने लगा था | उस ने अपना स्वरूप  चतुर्भुजा करी रूप  शंख , पद्म सुदर्शन चक्र पिताम्वर धरण कर  वह दुनियां में अपने को  श्री क्रष्ण के नाम से पूजने लगा  समाज के श्रद्धावान लोग  श्री क्रष्ण एवं कशी नरेश  पुंडरिक में अंतर  भूल गए एवं  पुंडरिक की पूजा करने लगे | लेकिन यह...